Vishnu Narayan Bhatkhande Biography in Hindi Jivini Jeevan Parichay 1860

Vishnu Narayan Bhatkhande Biography in Hindi

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Vishnu Narayan Bhatkhande Jeevan Parichay in Hindi

जन्म-

श्री विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म 10 अगस्त सन 1860 को बम्बई प्रांत के बालकेश्वर नामक स्थान में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था



Vishnu Narayan Bhatkhande Jivini in Hindi

विष्णु नारायण भातखंडे की जीवनी हिंदी में

प्रारंभिक जीवन-

• जबकि स्वयं एक पेशेवर संगीतकार नहीं थे, उनके पिता, जिन्होंने एक समृद्ध व्यवसायी के लिए काम किया,  उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि विष्णु नारायण और उनके भाई-बहन शास्त्रीय संगीत में शिक्षा प्राप्त करें।

• 1884 में, भातखंडे बंबई में गायन उत्तेजक मंडली, एक संगीत प्रशंसा समाज के सदस्य बने, जिसने संगीत प्रदर्शन और शिक्षण के साथ उनके अनुभव को व्यापक बनाया।

• उन्होंने मंडली में छह साल तक अध्ययन किया और श्री रावजीबुआ बेलबागकर और उस्ताद अली हुसैन जैसे संगीतकारों के तहत ख्याल और ध्रुपद दोनों रूपों में विभिन्न प्रकार की रचनाएं सीखीं।

• 1900 तक भातखंडे के लिए संगीत अभी भी एक इत्मीनान की चीज थी जब उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई, उसके बाद 1903 में उनकी बेटी की मृत्यु हो गई।

• इसके कारण उन्होंने अपना कानून अभ्यास छोड़ दिया और अपना पूरा ध्यान संगीत की ओर समर्पित कर दिया

शिक्षा-

•उन्हें अपने पिता से जिन्हें संगीत से अथाह प्रेम था, संगीत सीखने की प्रेरणा मिली। अत: वे स्कूली शिक्षा के साथ-साथ संगीत शिक्षा भी ग्रहण करते रहे

•उन्होंने सितार, गायन और बांसुरी की शिक्षा प्राप्त की और तीनो का अच्छा अभ्यास किया।

•सेठ बल्लभदास और गुरुराव बुआ बेलबाथकर, जयपुर के मुहम्मद अली खाँ, ग्वालियर के पं०एकनाथ,रामपुर के कस्बे अली खाँ आदि व्यक्तियों से गायन सीखा।

•सन 1883 में बी० ए० और 1890 में एल. एल० बी० की परिक्षाएं उत्तीर्ण की । कुछ समय तक ये वकालत करते रहे,परन्तु संगीत के महान प्रेमी का मन वकालत में नही लगा। वकालत छोडकर संगीत की सेवा में लग गए।

आजीविका –

• भातखंडे ने पूरे भारत की यात्रा की, उस्तादों और पंडितों से मुलाकात की और संगीत पर शोध किया।

• उन्होंने नाट्य शास्त्र और संगीत रत्नाकर जैसे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन शुरू किया।

• भारत में अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने बड़ौदा, ग्वालियर और रामपुर की तत्कालीन रियासतों में समय बिताया।

• रामपुर में वे मियां तानसेन के वंशज महान वीणा वादक उस्ताद वजीर खान के शिष्य थे।

• भातखंडे ने दक्षिण भारत की यात्रा की और 1904 में मद्रास पहुंचे। स्थानीय संपर्कों की मदद से उन्होंने खुद को कर्नाटक संगीत की दुनिया से परिचित कराना शुरू किया।

• भातखंडे की पहली प्रकाशित रचना, स्वर मलिका, एक पुस्तिका थी जिसमें सभी प्रचलित रागों का विस्तृत विवरण था।

• 1909 में, उन्होंने छद्म नाम ‘चतुर-पंडित’ के तहत संस्कृत में श्री मल्लक्षय संगीतम प्रकाशित किया।

• भातखंडे ने अपनी सभी रचनाएं विष्णु शर्मा और चतुरपंडित दो छद्मनामों में से एक के तहत लिखीं।

कार्य-

•संगीत के शास्त्रीय पक्ष की ओर संगीतज्ञों का ध्यान आकर्षित करने का श्रेय पं० जी को जाता है।

•उन्होंने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण किया और संगीत के प्राचीन ग्रन्थों की खोज की।

•यात्रा में जहां भी उन्हें संगीत का कोई विद्वान मिला उनसें सहर्ष मिलने गये।

•इन्होंने विभिन्न रागों के बहुत से गीत एकत्रित किये और उनकी स्वरलिपि हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति, क्रमिक पुस्तक मालिका ६ भागों में संग्रह कर संगीत प्रेमियों के लिए अथाह भंडार रख दिया।

•क्रियात्मक संगीत को लिपिबद्ध करने के लिये भातखंडे जी ने एक सरल एवं नवीन स्वरलिपि की रचना की, जो भातखंडे स्वरलिपि के नाम से प्रसिद्ध है। यह अन्य की तुलना में सरल और सुबोध है।

•इसके अतिरिक्त राग वर्गीकरण का एक नवीन प्रकार-थाट राग वर्गीकरण को प्रचारित करने का श्रेय भातखंडे जी को हैं।

•उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से सम्स्त रागों को १० थाटों में विभाजित किया ।उनके समय में राग रागिनी पद्धति प्रचलित थी। उन्होंने उसकी कमियों को समझा और उसके स्थान पर थाट का प्रयोग किया तथा काफी के स्थान पर बिलावल को शुद्ध थाट माना।

•संगीत के प्रचार हेतु संगीत सम्मेलनों की आवश्यकता समझी और सन १८१६ में बडौदा नरेश की सहायता से प्रथम संगीत सम्मेलन सफलतापूर्वक आयोजित किया। उस सम्मेलन में अखिल भारतीय संगीत अकादमी स्थापित करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ। उनके प्रयत्न से कई संगीत-विद्यालयों की स्थापना हुई। उनमे से मुख्य है- मेरिस म्यूजिक कालेज वर्तमान नाम भातखंडे संगीत महाविद्यालय लखनऊ, माधव संगीत विद्यालय ग्वालियर तथा म्यूजिक कालेज बडौदा।

उनके द्वारा रचित मुख्य पुस्तकों की सूची इस प्रकार है-

  • हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति(क्रमिक पुस्तक मालिका ६भागों में)
  • भातखंडे संगीत शास्त्र ४ भागों में
  • अभिनव राग मंजरी
  • लक्ष्य संगीत
  • स्वरमालिका आदि।

संस्थाएं –

•भातखंडे ने हिंदुस्तानी संगीत के व्यवस्थित शिक्षण के लिए भारत में स्कूलों और कॉलेजों की शुरुआत की।

•1916 में उन्होंने बड़ौदा राजकीय संगीत विद्यालय का पुनर्गठन किया और बाद में ग्वालियर के महाराजा की सहायता से ग्वालियर में माधव संगीत महाविद्यालय की स्थापना की।

•भातखंडे ने पाठ्यपुस्तकों की एक श्रृंखला के रूप में हिंदुस्तानी संगीत साहित्यिक पुस्तक मालिका तैयार की।

•उन्होंने हिंदुस्तानी और कर्नाटक शास्त्रीय संगीतकारों के बीच चर्चा के लिए एक आम मंच प्रदान करने के लिए अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों की परंपरा भी शुरू की।

मृत्यु-

इस प्रकार भातखंडे जी जीवन भर संगीत की सेवा करते रहे और 19 सितम्बर 1936 को उनका स्वर्गवास हो गया। वास्तव विष्णु दिगम्बर पलुस्कर एवं विष्णु नारायण भातखंडे एक दूसरे के पूरक थे । एक ने संगीत का भव्य रूप जनता के सम्मुख रखा तो दूसरे ने उसे देखने के लिये ज्ञान चक्ष प्रदान किये। संगीत के साथ ये दोनों विभूतियाँ भी अमर रहेंगी।

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कुछ सवाल जबाव –

विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म स्थान और जन्म तिथि क्या है ?

10 अगस्त सन 1860 को बम्बई प्रांत के बालकेश्वर नामक स्थान में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था

विष्णु नारायण भातखंडे की मृत्यु कब हुई ?

19 सितम्बर 1936

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